Thursday, October 28, 2010

रंजिश ही सही तुझे हमसे

रंजिश ही सही तुझे हमसे,
मगर तू आ,
दिल को हमारे दुखाने के लिए ही सही,
मगर तू लौट कर आ.

झलक हमें अपनी दिखलाने के लिए ही सही,

मगर तू आ,
फिर तनहा हमें छोड़ जाने के लिए ही सही,
मगर तू लौट कर आ.

अपने हुस्न के जलवों से फिर से फिरसे हमें मदहोश करने के लिए ही सही,

मगर तू आ,
अपनी तीखी तेज़ निगाहों से हमपर कहर बरसाने के लिए ही सही,
मगर तू लौट कर आ.

शिद्दत से तेरे इंतज़ार मई तड़प रहे परवाने को जलने के लिए ही सही,

मगर तू आ,
खाक मई हमारी हस्ती को मिलने के लिए ही सही,
मगर तू लौट कर आ.

रो रो कर सुर्ख हुयी इन अंकों मई फिर से आसन भर जाने के लिए ही सही,

मगर तू आ,
खामोश तनहाइयों मई अपनी सरगम सी बोली की बरसात की बरसात करने के लिए ही सही,
मगर तू लौट कर आ.

गुन्हेगार समझ हमें अपनी खता की सजा देने के लिए ही सही,

मगर तू आ,
हमारे अरमानो को फिर से कुचलने के लिए ही सही,
मगर तू लौट कर आ.

झाक्मों से उभरे हमारे दिल को फिर से चोट पहुचाने के लिए ही सही,

मगर तू आ,
चेतन है हम अभी इस बात का एहसास दिलाने के लिए ही सही,
मगर तू लौट का आ.

शिख्वा न होगा जरा भी एक बार जो बस तू अपने सरसराते हुए होटों से मधुरस पिला दे,

फिर जो गर तेरा दिल करे तोह उस मधुरस मई ज़हर की पूरी बोतल मिला दे,
कमस कम बाद फिर लोग ये तोह कहेंगे के देखो आशिके रसूल जा जनाज़ा जा रहा है,
मगर एक बार तू लौट कर आ फिर चाहे तोह महबूबा मौत से मिला जा.